Sunday, March 26, 2023
अर्जुन उवाच
स्थितप्रग्यष्य का भाषासमाधिष्थस्य केशव ।
स्थितधी: किम्प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥ (54)
अर्जुन बोले ---- हे केशव समाधि मे स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिर बुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है ? वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है , कैसे बैठता है और कैसे चलता है ।
श्री भगवान उवाच
प्रजहाति यदा कामांसर्वांपार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थित्प्रग्यस्तदोच्यते ॥(55)
श्री भगवान बोले ==हे अर्जुन जिस काल मे यह पुरुष मन मे स्थित सम्पूर्ण कामनाओ को भली भांति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा मे ही संतुष्ट रहता है , उस काल मे वह स्थित प्रग्य कहा जाता है ।
Saturday, March 25, 2023
Thursday, May 16, 2019
भांति भांति के वचनो को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा मे अचल और स्थिर ठहर जायेगी , तब तू योग को प्राप्त हो जायेगा अर्थात तेरा परमात्मासे नित्य सन्योग हो जायेगा ।
Tuesday, May 14, 2019
बहुशाखा ह्यनंताश्च बुधयो$व्यवसायिनाम ॥(41)
अर्थ: अर्जुन इस कर्म योग मे निश्चयात्मिकाबुद्धि एक ही होती है किंतुअस्थिर विचारवाले विवेकहीन सकाम मनुष्यो की बुद्धि निश्चय ही बहुत भेदों वालीऔरअनंतहोतीहैं ।
यामिमामं पुष्पितामं वाचं प्रवदंत्यविपश्चितः ।
वेदवादरतः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥(42)
कामात्मनः स्वर्गपरा जन्म् कर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥(43)
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापर्हतचेतसाम् ।
अर्थ: व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥(44)
हेअर्जुन जो भोगों मे तन्मय हो रहेहैं जोकर्मफल केप्रशंसकहैं वे वेद वाक्यों मेही प्रीति रखतेहैं जिनकी बुद्धिमेस्वर्ग प्राप्तिही परमप्राप्यवस्तु हैऔरजोस्वर्गसेबढ्करकुछभीनहीहै वेअविवेकीजन इसप्रकारकी जिसपुष्पितअर्थात दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करतेहैं जोकि जन्म रूप कर्मफलदेनेवाली एवम्ऐस्वर्य की प्राप्ति के लिये नानाप्रकार की बहुत सारी क्रियाओ का वर्णनकरनेवाली हैं,उस वाणीद्वाराजिनका चित्त हर लिया गयाहै,जो भोग एवम ऐस्वर्य मेअतंतआसक्तहै उनपुरुषों की परमात्मा मे निश्चयात्मिका बुद्धि नही होती ।42-44
त्रैग्य्न्यविषया वेदा निष्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
अर्थ: निर्द्वंदो नित्यसत्वस्थो नियोगक्षेम आत्मवान ॥ (45)
हे अर्जुन वेदउपरोक्त तीन प्रकार से तीनो गुणो केकार्य रूप समस्त भोगो एवम उनके साधनोका प्रतिपादनकरनेवाले हैं इसलिये तू उनभोगो एवम एवम उनके साधनो मेआसक्ति हीन, हर्ष,शोक आदि द्वंदो से रहित नित्य वस्तु परमात्मामे नित्य स्थित योगक्षेम कोनचाहने वाला और स्वाधीन अंत:करण वाला हो ।45
अर्थ: यावानर्थ उदपाने सर्वतःसम्प्लुतोद्के ।
तावांसर्वेषुवेदेषु ब्राम्हणस्य विजानतः ॥(46)
सब ओर से परिपूर्ण जलाशय केप्राप्त होजाने पर छोटे जलाशय मेजितनाप्रयजन रहताहै ,ब्रम्ह कोतत्व सेजानने वालेब्राम्हण काभी समस्त वेदों मे उतना हीप्रयोजन रहता है।46
कर्मन्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
अर्थ: मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगो$स्तत्वकर्मणि ॥(47)
तेराकर्म करने मे ही अधिकार है उसकेफल मे कभी नहीं।इस्लिये तू कर्मों के फल का हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करनेमे भी आसक्ति न हो।
योगस्थः कुरुकर्माणिसंगमंत्यक्त्वाधनंजय ।
अर्थ: सिद्ध्यसिध्यो:समोभूत्वा समत्वंं योग उच्यते ॥(48)
हे धनंजय तू आसक्ति को त्याग कर तथासिद्धि और असिद्धि मे समान बुद्धि वाला होकर योग मे स्थित हुआ कर्तव्य कर्मो को कर,समत्व ही योग कहलाताहै।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
अर्थ: बुद्धौ शरण्मंविच्छ क्रपण: फलहेतव: ॥ (49)
इस समत्व रूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यंत ही निम्नस्रेणी का है इसलिये हे धनंजय तू सम बुद्धि मे हई रक्षा का उपाय ढूंढ। अर्थात बुद्धि योग का ही आस्रय ग्रहण कर।क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यंतदीन हैं।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुक्रतदुष्कक्रते ।
अर्थ: तस्माद्योगाय युज्यस्व योग:कर्मसु कौशलम् ॥(50)
समबुद्धि युक्त पुरुष पुन्य और पाप दोनो को इसी लोक मे त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाताहै । इससे तूसमत्व रूप योग मे लगाजा। यह समत्व रूप योग ही कर्मोन मे कुशलता है ।
कर्मजं बुद्धियुक्ताहि फलंत्यक्त्वा मनीषिण:।
अर्थ: जन्मबंधविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ (51)
क्योंकि समबुद्धि से युक्त ग्यानीजन कर्म से उत्पन्न होने वाली फल को त्याग कर जन्म रूप बंधन से मुक्त होकर निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं।
यदा ते मोह्कलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
अर्थ: तदा गंतासि निर्वेदंं ष्रोतव्यस्य ष्रुतस्य च ॥(52)
जिस काल मे तेरी बुद्धि मोह रूप दल दल को भली भांति पार कर जायेगी , उस समय तू सुने हुए और सुनने मे आनेवाले इस लोक और पर लोक सम्बंधी सभी भोगो से वैराग्य को प्राप्त होजायेगा ।
ष्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
अर्थ: समाधावचला बुद्धिस्तदा योग्मवाप्स्यसि॥ (53)
भांति भांति के वचनो को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा मे अचल और स्थिर ठहर जायेगी , तब तू योग को प्राप्त हो जायेगा अर्थात तेरा परमात्मासे नित्य सन्योग हो जायेगा ।
Friday, March 24, 2017
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चय: ॥ (३७)
अर्थ : या तो तू युद्धमे मारा जाकर स्वर्ग का राज भोगेगा । अथवा संग्राम में जीत कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन !तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा ।
श्लोक ; सुख दु: खे समे कृत्वा लाभा- लाभौ जया जयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥ (३८)
अर्थ जय-पराजय,लाभ-हानि और सुख- दुःख को समान समझ कर ,यद्ध के लिए खड़ा हो जा ;इस प्रकार युद्ध करने से से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा ।
श्लोक : एशा ते$भिहिता सांख्ये बुद्धर्योगे त्विमां श्रणु ।
बुदधि युक्तो यया पार्थ कर्मबधनप्रहास्यसि ॥ (३९)
अर्थ : हे पार्थ यह बुद्धि तेरे लिए ध्यान योग के विषय में कही गयी और अब तू इसको कर्म के योग केविषय में सुन - जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मो के बंधन को भली भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा ।
श्लोक : नेहाभिक्रमनाशो$स्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात ॥ (४०)
अर्थ : इस कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फल रूप दोष भी नहीं है , बल्कि इस कर्म योग रूप का थोड़ा भी साधन जन्म मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है ।