श्लोक : य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतं ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ (१९ )
अर्थ : जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है , वे दोनों ही नहीं जानते क्योकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मरता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है
श्लोक : न जायते म्रियते वा कदाचि -
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूय : ।
अजो नित्य: शाश्वतोयं पुराणो -
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ (२०)
अर्थ : यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न तो मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला भी है ; क्योकि यह अजन्मा , नित्य , सनातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता ॥
श्लोक : वेदा विनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययं ।
कथं स पुरुष : पार्थ कं घातयति हन्ति कम ॥ (२१)
अर्थ : हे प्रथा पुत्र अर्जुन जो पुरुष इस आत्मा को नाश रहित , नित्य , अजन्मा और अव्यय जानता है , वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है ।
श्लोक : वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरो$पराणि ।
तथा शरीराणि विहायजीर्णा -
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ (२२)
अर्थ : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रो को त्याग कर दूसरे नए वस्त्रो को ग्रहण करता है , वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरो को छोड़ कर दूसरे नए शरीरो को प्राप्त करता है ।
No comments:
Post a Comment