व्याख्या : भरत वंशियों अर्थात पांडवों एवं कौरवों में एक पक्ष राज छोड़ना नहीं चाहता है और दूसरा पक्ष एन केन प्रकारेण युद्ध न हो और शांति से मामला हल हो जाये अर्थात वार्तालाप से मामला सुलझ जाए तथा युद्ध टल जाए और आपसी समझौता कारगर हो ऐसी मान्यता वाले पांडव जन शांति सुलह के प्रयासों में असफल हो , जब युद्ध भूमि में आये तब परम पराक्रमी अर्जुन ने दोनों सेनाओं के बीच रथ को ले जाने की बात कही ताकि वह मध्यम मार्ग में खड़ा हो एवं अपने प्रति द्वंदियों को देख सके की इस घोर युद्ध में अन्याय का साथ देने उसके कितने अपने और पराये आये है अर्जुन के सोच विचार की व्यापकता भी उतनी ही है जितना की वह स्वयं में महान योद्धा है वह श्री कृष्ण का विनम्र भक्त भी है वह काल जयी योद्धा द्वेष को लेकर समरांगन में नहीं उतरा अपितु उन अपनो का चेहरा देखने युद्ध के मध्य में आया जो स्वार्थ के वशी भूत होकर अकारण एक दूसरे का रक्त बहाने आये हैं I सम्प्रति उसके मन में अपनो के प्रति चाहत थी जो विशुद्ध मानवीय थी तथापि युद्ध समय की मांग एवं परिस्थिति जन्य था I (यह व्याख्या है श्लोक २१ एवं २२ की )
योत्स्यमानानवेक्षेहम य एतेsत्र समागता :I
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियाचिकिर्शव II २३
अर्थ : दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो जो ये राजा लोग इस सेना में आये है इनयुद्ध करने वालों को मैं देखूँगा
व्याख्या : अर्जुन ने भगवान वासुदेव से कहा मुझे उन लोगों के चेहरे देखने दी जिए जो दुर्बुद्धि दुर्योधन का पक्ष लेने समरांगन में उतारे है I यह वक्तव्य अर्जुन के मन में किसी द्विविधा ,भय या सकोच के कारण नहीं और न ही युद्ध पूर्व किसी योद्धा से छल पूर्वक अपने पक्ष में करने का रहा है बल्कि उस महान धनुर्धर ने युद्ध के मद्ध्य में आकर उन योद्धाओं के चहरे देखने चाहे जो संभवतयुद्धपूर्व अर्जुन के चाहने वाले रहे हों या पांडवों के प्रति स्नेह का भाव रखने या सहानुभूति रखने वाले हों तथापि किसी कारण वश दुर्बुद्धि ,दुर्मति दुर्योधन का साथ दे रहे हों अर्जुन की ऐसी युद्ध व्यंजना रण नीति के तहत थी ताकि अपने विरुद्ध युद्ध के लिए आने वाले योद्धाओं का मनो वैज्ञानिक परीक्षण कर सके और युद्ध को अपने अनुकूल परिणति दे सके युद्ध जब एक परिवार के मद्ध्य तय हो जाये तब धर्म संकट की स्थिति आती है तब ऐसा भी लग सकता है की क्या इनसे भी युद्ध करना है मुझे ? क्या ये भी लड़ेंगे मुझसे आखिर यह युद्ध था महत्वाकांक्षाओं का ,हठ, का व्यामोह का ,अधर्मसे राज्य हड़पने का और दो भाईओं की संतति के बीच का I ऐसे में महान विचार वान परम कृष्ण भक्त अर्जुन का उन लोगों को देखने का मन में भाव आना स्वाभाविक था
Sunday, July 11, 2010
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