Friday, July 9, 2010

shri madbhagvadgita pratham addyaay ...aage..

अथ व्यवस्थितान द्रस्त्वा धार्तरास्त्रान कपिद्ध्वज : I
प्रवृत्ते शश्त्र सम्पाते धनुरुद्यम्य पांडव : II  २० 
हृषिकेशम तदा वाक्यमिदमाह  महीपते I (२१ अर्धांश पूर्व )
अर्थ :  हे राजन इसके बाद कपिद्ध्वज  अर्जुन ने मोर्चा बाँध कर डटे हुए ध्रतराष्ट्र -सम्बन्धियों को देख कर ,उस शश्त्र चलाने की तयारी के समय धनुष उठाकर हृषिकेश श्रीकृष्ण  महाराज से ये वचन कहा I
                                                      अर्जुन उवाच
सेनयोरुभओर्मद्ध्ये   रथं स्थापय मेंsअच्युत  II (२१ अर्धांश उत्तर )
अर्थ :हे अच्युत मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिये
यावाद्देत्ता न्निरीक्षेहम योद्धुकामानावास्थितन I
कैर्मया        सह   योद्धव्यमस्मिन्रंसमुद्य्म्मे II ( २२ )
अर्थ :और जब तक क़ि मैयुद्ध  क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख लूं की इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे  किन किन के साथ युद्ध करना योग्य है I तब तक उसे खड़ा रखिये I

No comments:

Post a Comment